यह कहानी सिर्फ़ आरक्षण की नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के न्याय और अस्तित्व की है। अकोला में बंजारा आरक्षण कृती समिती ने महाराष्ट्र के बंजारा समाज के अधिकारों की लड़ाई को फिर से तेज़ कर दिया है। जिल्हाधिकारी अकोला को सौंपे गए निवेदन में समिति ने स्पष्ट किया कि जिस हैदराबाद गज़ट (1920) के आधार पर मराठा समाज को आरक्षण देने का निर्णय लिया गया, उसी गज़ट में “Lambada’s otherwise called Banjara’s or Sugali’s” को भी अलग, विशिष्ट और आदिवासी जनजाति के रूप में दर्ज किया गया है।
आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में यह समाज अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) के आरक्षण का लाभ ले रहा है। नांदेड, परभणी, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), उस्मानाबाद, बीड, जालना, लातूर, हिंगोली जैसे ज़िलों में बंजारा समुदाय को पहले आरक्षण मिलता था, क्योंकि ये ज़िले सी.पी. एंड बेरार प्रोविंस और पुराने हैदराबाद राज्य का हिस्सा थे।
वापट आयोग, इधाते आयोग और भाटिया आयोग पहले ही सिफ़ारिश कर चुके हैं कि बंजारा समाज अनुसूचित जनजाति के सभी मापदंडों पर खरा उतरता है। तांडा में रहने वाला यह समुदाय आज भी 80% मज़दूरी कर रहा है। अलग वेशभूषा, अलग बोली और ऐतिहासिक अन्याय के बावजूद राज्य और केंद्र सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
अकोला में होने वाले धरणे आंदोलन में बंजारा समाज की तीन मुख्य मांगें होंगी –
- महाराष्ट्र में बंजारा समाज को निर्विवाद एस.टी. आरक्षण लागू किया जाए।
- हैदराबाद गज़ट और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अधिसूचना जारी की जाए।
- आरक्षण के हक़ में खड़ी प्रशासनिक बाधाओं को हटाया जाए।
बंजारा समाज ने चेतावनी दी है कि अगर इस मुद्दे पर सरकार ने अब भी न्याय नहीं दिया तो यह आंदोलन और तीव्र होगा।
