भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक अहम मोड़ आया है। मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने महाराष्ट्र के अकोला में हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच को लेकर 11 सितंबर को दिए गए आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह वही आदेश था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम पुलिस अधिकारियों की संयुक्त एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया था, ताकि जांच में निष्पक्षता बनी रहे।
लेकिन अब अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की समीक्षा याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इस आदेश के उस हिस्से पर रोक लगा दी है। सरकार ने अपने पुनर्विचार याचिका में कहा कि जांच एजेंसी को धर्म के आधार पर बांटने का आदेश न केवल अनुचित है बल्कि यह संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना पर सीधा प्रहार करता है।
राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि यह आदेश वर्दी में धर्म की लकीर खींचने जैसा है — और इससे सुरक्षा बलों के भीतर धार्मिक विभाजन की भावना पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि कानून के रखवाले की पहचान उसके धर्म से नहीं, बल्कि उसकी ईमानदारी और निष्पक्षता से होनी चाहिए।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है। तब तक ‘हिंदू-मुस्लिम एसआईटी’ के गठन से जुड़ा आदेश स्थगित रहेगा।
अब पूरा देश एक बार फिर एक कठिन सवाल के सामने खड़ा है — क्या धर्म की पहचान न्याय की प्रक्रिया में जगह पा रही है? क्या निष्पक्षता के नाम पर धर्म के चश्मे से न्याय को देखा जा रहा है?
यह सिर्फ अकोला की कहानी नहीं, यह सवाल भारत की न्याय प्रणाली की आत्मा से जुड़ा है — कि क्या वर्दी के भीतर अब भी इंसान बचा है या धर्म की परछाई हावी हो चुकी है।
