अकोला के जिलाधिकारी कार्यालय में मनाया गया अल्पसंख्यक अधिकार दिवस एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि यह उस सोच का संकेत था जहाँ प्रशासन सिर्फ़ आदेश नहीं देता, संवाद भी करता है। नियोजन भवन में जुटे छात्र, सामाजिक प्रतिनिधि और अधिकारी—सब मिलकर यह बता रहे थे कि अधिकारों की बात मंच से नहीं, भागीदारी से आगे बढ़ती है।
कार्यक्रम में उपजिलाधिकारी गायकवाड़, विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि, शिक्षा व नियोजन विभाग के अधिकारी और पुलिस प्रशासन की मौजूदगी ने एक साझा तस्वीर बनाई—जहाँ शासन और समाज आमने-सामने बैठकर सवाल-जवाब कर सकते हैं। दारुल क़ज़ा के क़ाज़ी मुफ्ती अशफाक क़ासमी की उपस्थिति ने धार्मिक संवाद को संवैधानिक मूल्यों से जोड़ने का संदेश दिया। वहीं माइनॉरिटी डेवलपमेंट सेंटर के सेक्रेटरी डॉ. मुजाहिद अहमद की सक्रिय भूमिका ने कार्यक्रम को सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखा।
बौद्ध, जैन, सिख और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों का एक मंच पर होना इस बात का प्रमाण था कि प्रशासन ने विविधता को औपचारिकता नहीं, जिम्मेदारी माना। अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़ी योजनाओं की जानकारी दी गई, प्रतियोगिताओं के माध्यम से विद्यार्थियों को अवसरों से जोड़ने का आह्वान हुआ और यह साफ़ संदेश गया कि योजनाएँ फाइलों तक सीमित नहीं रहेंगी।

महाराष्ट्र माइनॉरिटी NGO फोरम के ज़िला अध्यक्ष डॉ. जुबैर नदीम ने प्रशासन का आभार जताते हुए विकास से जुड़ी व्यावहारिक मांगें रखीं—जिनमें मौलाना आज़ाद विकास महामंडल के कार्यालय का स्थानांतरण और ज़िले में विशेष बजट की अपेक्षा शामिल रही। फोरम के डायरेक्टर मोहम्मद रफीक ने विद्यार्थियों को प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया।
लोकतंत्र ऐसे ही सांस लेता है—जब प्रशासन मंच देता है, समाज बोलता है और भरोसा बनता है। अकोला में यह भरोसा, सरकारी भवन की दीवारों से निकलकर लोगों तक पहुंचता दिखा।
